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श्री श्रीवास ठाकुर

श्री श्रीवास ठाकुर

श्रीवास पंडित को नारद मुनी के अवतार के रूप में वर्णित किया गया है। श्रीवास ठाकुर के माध्यम से, भगवान चैतन्य ने हमें सिखाया कि वह अपने भक्त के प्रेम के वशीभूत है और कैसे कोई भी जो उनके भक्त को प्रिय है, वह भी उनके दिल पर विजय प्राप्त कर सकता है।

चूंकि युवा निमाई पंडित अपनी शिक्षा से अहंकारी हो गए थे, एक दिन श्रीवास पंडित ने उनसे कहा, “लोग क्यों पढ़ते हैं? ताकि वे समझ सकें कि श्री कृष्ण की भक्ति क्या है। यदि शिक्षा से श्री कृष्ण की भक्ति नहीं मिलती है, तो उसका क्या फायदा? यह केवल एक कठिन प्रयास बन जाता है जो अंत में समय की बर्बादी के अलावा कुछ भी नहीं है। यदि आपने वास्तव में कुछ सीखा है तो अब श्री कृष्ण की पूजा शुरू करें। जल्दी करो। यह आपके जीवन का उद्देश्य है। “

निमाई हँसे और उन्होंने जवाब दिया, “आपकी दया से निश्चित रूप से ऐसा होगा। अगर आप मुझपें दयालु हों, तो निश्चित रूप से मैं श्री कृष्ण की भक्ति प्राप्त करूंगा।” इसके तुरंत बाद महाप्रभु गया गये जहां उन्होंने श्री इश्वर पुरी से दीक्षा स्वीकार की। भगवान हमें यह दिखाना चाहते थे कि महान वैष्णवों की दया के बिना कृष्णा की भक्ति प्राप्त करने की कोई उम्मीद नहीं है। भगवान कृष्ण का जन्म मथुरा में हुआ था, लेकिन वृंदावन में उन्होंने अपनी सबसे अंतरंग लीलाएँ प्रदर्शित की थी। इसी तरह भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु का जन्म जगन्नाथ मिश्रा के घर में हुआ था, लेकिन उन्होंने श्रीवास ठाकुर के घर में अपनी सबसे अंतरंग लीलाओं का प्रदर्शन किया था।

एक रात जबकि भगवान गौरांग श्रीवास ठाकुर के घर में कीर्तन कर रहे थे, उनके बेटे ने, जो बुखार से पीड़ित था, शरीर छोड़ दिया।  घर की महिलाओं ने बहुत जोर से रोना शुरू कर दिया। श्रीवास ठाकुर उनका रुदन सुनकर जल्दी से कमरे में भागें, वहाँ उन्होंने पाया कि उनका पुत्र उनके सामने मृत पड़ा है। उन्होनें उनसें यह रोना छोड़ने के लिए बोला, और कहा कि अगर कोई पवित्र नाम और कृष्ण की महिमा सुनकर मर जाए तो कोई दुःख नहीं होना चाहिए, यहां तक ​​कि सबसे पापपूर्ण व्यक्ति के लिए भी नहीं। मेरा बेटा इतना भाग्यशाली है कि उसने अपने शरीर को भगवान चैतन्य और उनके भक्तों के हरिनामं संकीर्तन को सुनकर छोड़ा। पूर्ण पुरूषोतम भगवान गौरांग महाप्रभु के रूप में, व्यक्तिगत रूप से हमारे घर में नाच रहै है। इस माहौल में मेरा बेटा इतना भाग्यशाली है कि वह मर गया। अब वह आध्यात्मिक दुनिया, वैकुंठ लोक को लौट गया है।अब यदि आप रोना चाहते हैं, तो चुपचाप अपने दिल मे रो, लेकिन किसी को यह न बताएं कि क्या हुआ है, क्योंकि यदि आप मेरे भगवान गौरांग के उत्साही नृत्य मे बाधा डालते हैं तो मैं अपनी गर्दन के चारों ओर एक बर्तन बांधूंगा और आज ही गंगा में डूब जाऊंगा।

इन सभी शब्दों को बोलने के बाद श्रीवास ठाकुर कीर्तन में वापस चले गए और अपने चेहरे पर एक बड़ी मुस्कुराहट के साथ और भगवान चैतन्य और उनकेसहयोगियों के साथ नृत्य करना शुरू कर दिया। कीर्तन पूरे रात चला। जब भगवान चैतन्य को इस घटना के बारे में पता चला, तो वे प्रेमवश रोने लगे और कहा कि मैं कभी भी इस तरह के शुद्ध भक्त को कैसे छोड़ सकता हूं। उसे मुझसे इतना प्रेम है कि वह अपने बेटे की मौत के दुःख को व्यक्त करने की अपेक्षा भी नहीं करता है।

महाप्रभु ने श्रीवासा को यह वरदान दिया: “आपके घर में कभी गरीबी नहीं होगी। यदि आप बस घर के अंदर रहते हैं, तो जो कुछ की भी आपको आवश्यकता है, आपके दरवाजे पर आ जाएगा।”